हे राम !

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गिरिजा शरण


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लाचार—दीपावली

Posted On: 9 Nov, 2012  
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हे राम ! आप कैसे भगवान है?

Posted On: 22 Sep, 2012  
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सगुण राम निर्गुण कहलाये. गुणातीत ते ब्रह्म सुहाए

Posted On: 11 Sep, 2012  
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अब तो आओ राम

Posted On: 12 Jul, 2012  
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जीवन या प्रयोगशाला?

Posted On: 12 Jun, 2012  
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हम या ईश्वर? 2

Posted On: 4 Jun, 2012  
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हम या ईश्वर?

Posted On: 23 May, 2012  
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हे राम! भीखारी को भीख दें, घृणा न करें

Posted On: 19 May, 2012  
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नाम की महिमा अपरम्पार

Posted On: 4 May, 2012  
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ना समझ न समझे राम नाम क़ी महिमा

Posted On: 26 Apr, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

श्री गिरिजा शरण जी, संभवतः आप को यह याद है क़ि "बिनु परतीति होय नहीं प्रीती" . तो परतीति के लिए तो प्रयोग करना ही पडेगा. अब रही बात क़ि जिसका प्रयोग एवं परिणाम पहले ही हस्त गत हो चुका हो, उसी के पीछे समय क्यों वृथा करना? परतीति के लिए प्रयोग तो नयी चीज के लिए होना चाहिए. किन्तु वही यक्ष प्रश्न पुनः समक्ष खडा होगा. क़ि जीवन का हर एक अग्रिम पल नया होता है. तो क्या इस हर नवीन पल को प्रयोग में ही व्यतीत करना चाहिए? प्रत्येक शरीर नया हो सकता है, लक्ष्य एक ही होगा-सुख एवं खुशी, भले ही वह किसी को दुखी कर के हो या किसी को सुखी कर के. पुनः जीव एक ही होगा जो नित्य कर्म का साक्षी बनता है. अतः प्रयोग के लिए जीवन नहीं बल्कि जीवन के लिए प्रयोग होना चाहिए जो नित नवीन होने पर पृथक अपनी प्रकृति के अनुसार गुणात्मक परिणाम प्रदान करता है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: rdx4u rdx4u

आदरणीय श्री संतोष कुमार जी हो सकता है, आप मुझसे ज्यादा गुरूजी के बारे में जानते हो. किन्तु मैं जो भी जानता हूँ, वह एक महान विभूति का रूप है. उन्होंने ही एक नाम आप का भी बताया था. जानते है गुरुदेव ने मूरख (विदूषक) को किस रूप में परिभाषित किया है? उन्होंने ही बताया कि एक आदर्श विद्वान ही संयमित एवं सभ्य विदूषण क़ी रचना कर सकता है. अब यह उसकी विद्वता पर निर्भर है कि वह कितनी ऊंचाई तक पहुंचा है. मै कल ही आप का एक और लेख पढ़ा "तीर्थ राज प्रयाग और इलाहाबाद !----------यात्रा संस्मरण". और बहुत सारे चित्र मुझे सजीव मिल गये. जहाँ तक श्री प्रकाश जी का सवाल है, वह भी एक पहुंचे हुए फकीर है. अभी तों वह गये है गुरूजी के घर. एक मंदिर बन रहा है. उसी सम्बन्ध में गये है. आयेगें तों वह अवश्य इसे पढ़ेगें. और आप से नेट वार्तालाप करेगें. नमस्कार.

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण

आदरणीय श्री एस.पी. सिंह जी गुरु जी पण्डित आर. के. राय जी ने आप के बारे में कुछ बातें कही थी. खैर मैं आप से एक बात पूछना चाहता हूँ. क्या आप इस मंच पर वाह वाही लूटने आये थे. या अपने ब्लॉग में अपने विचार पोस्ट करने? यह तों मंच है. विचार तों आप के अपने है. जो सदा आप के साथ ही रहेगें. तों क्या आप अपने को भी छोड़ देगें? जिसको जितनी बुद्धि होती है वह उसी के अनुरूप अपनी भावना को भाषा के रूप में वाक्य बद्ध करता है. और अपनी इसी भाषाभिव्यक्ति से अपने स्तर का परिचय दे देता है कि उसका स्तर क्या है? तों आप उसे देख कर पहचानिए और मजे लीजिये कि विद्वानों के नाम पर कैसे कैसे लोग किस किस रूप में इस दुनिया में जी रहे है. शेष आप क़ी मर्जी. वैसे मैंने आप का मूषक एवं ऋषि का उद्धरण देखा. हो सकता है बहुतो को यह पसंद न हो. आप अपना काम करते रहिये. मेरी तों यही अपेक्षा है. शेष आप क़ी मर्जी.

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण

आदरणीया सुश्री गुप्ता जी सही पूछें तों मैं आकर्षित ही इसीलिए हुआ था कि यहाँ विचार के आदान प्रदान से परिचय एवं मित्रता का रिश्ता बनेगा. इस भाग दौड़ क़ी जिन्दगी में पता नहीं कब कौन किसके किस काम आ जाएगा. किन्तु कुछ चीजें मुझे बड़ी नागवार गुज़री है. वह यह कि अपनी थोथी विद्वता को दूसरो पर थोपना. और ऊपर से तोहमत लगाना. हम अपने विचार रखने के लिये तों स्वतंत्र है. किन्तु ज़बरदस्ती किसी को उसका अनुयायी बनाने का दबाव देना मेरी समझ से विद्वता क़ी किसी भी श्रेणी में नहीं आता है. फिर भी जिसकी जैसी सोच. मुझे तों ऐसे मित्र चाहिए जो मेरे विचारों से सहमत हो और मैं उनके. ढूंढ रहा हूँ. मिल ही जायेगें.

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण




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